एक दूसरे को जानने की ज़रूरत नहीं समझी,
एक हुए ऐसे , साथ रहने की ज़रूरत नहीं समझी।
लगता था मोहब्बत के सैलाब में बह के आए हैं,
उनहोंने किनारा तक ढूँढने की ज़रूरत नहीं समझी।
फूल थे , खुशबू थी, बागबां था हरा भरा,
एक माली भी रखने की ज़रूरत नहीं समझी।
ख़ुद मुवक्किल , ख़ुद वकील, ख़ुद ही मुंसिफ बने,
बुजुर्गों से भी सलाह की ज़रूरत नहीं समझी।
अब तो आलम है के इतने करीब हैं दोनों,
मैंने उसकी ,उसने मेरी ज़रूरत नहीं समझी।